आज हमारा समाज समझौतों का समाज हो गया है। हम हर स्तर पर समझौता करने के प्रयास में लगे रहते हैं। फिर चाहे वह राजनैतिक समझौते हो या सामाजिक। हम एक विशेष प्रकार की मुआवज़वादी मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं। हम इस विषय पर तनिक भी चिंतन नहीं करना चाहते की मुआवज़ा इन्साफ नहीं है। यदि मुआवज़ा इन्साफ होता यह समाज जिसे हम दोष देने में गुरेज नहीं करते कब का सुधर गया होता।
आपके समक्ष कुछ उदाहरण रखना चाहूँगा जो कहीं ना कहीं मेरे और आपके इसी समाज की मुआवाज़वादी मानसिकता की तस्वीर दिखाते हैं।
१- एक लड़की पर सरेराह तेज़ाब फेंका जाता है। वैसे तो इस तरह की घटनाएँ अब आम बात हो गयी हैं किन्तु यदि किसी करणवश यह मुद्दा मीडिया की नज़र में आ जाता है तो कुछेक दिन का हो हल्ला और अंत में लड़की को २०-२५ हजार का मुआवज़ा......
२- पश्चिम बंगाल में ब्रहमपुत्र नदी में एक नाव पर क्षमता से कहीं गुना ज्यादा लोग नदी पार करते हैं और नाव पलती है।
इसमें कई जाने जाती हैं। लेकिन हमे सरकार की तरफ से क्या मिलता है सिर्फ मुआवज़ा...........
३- भोपाल में हुयी सदी की सबसे बड़ी गैस त्रासदी को कौन भूल सकता है. आज भी भोपाल के उस हादसे को याद कर सिहर उठते हैं, लेकिन सरकार उस घटना के आरोपी को सजा दिलाने वजाए मुआवजे का मरहम लगा रही है।
४- पिछले दिनों महाराष्ट्र मंत्रालय में आग लगने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से आग की ख़बरें आनी शुरू ही गयी।दिल्ली में भी एक झुग्गी बस्ती में आग लगी उसमें भी पीड़ितों को क्या मिला. मुआवज़ा.......
मुआवज़ा.... मुआवज़ा.......मुआवज़ा.......हम और हमारी सरकार आखिर कब तक की आड़ में पीड़ितों को और प्रताड़ित करते रहेंगे. आखिर कब हम घटना के कारणों को खंगालेंगे और उन्हें समाप्त करेंगे। हमे इस मुआवाज़वादी मानसिकता को पूर्ण रूप समाप्त करना होगा. घटना के कारकों का समूल नाश करना होगा, अन्यथा आज़ादी के ६५ साल तो क्या हमें विकसित होने के लिए और ६५ साल इंतज़ार करना पड़ेगा।
अब हमें आज़ादी के लिए भी मुआबजा मिलना चाहिए........
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