Monday, 23 July 2012

समझ खोती मीडिया......


 पत्रकारिता का प्रादुर्भाव एक मिशन के रूप में हुआ था. आज से यदि चार पांच दशक पहले की पत्रकारिता पर द्रष्टिपात करें तो पत्रकारिता का स्वरुप वर्तमान की पत्रकारिता से बिलकुल भिन्न था. उस दौर की पत्रकारिता किसी भी  प्रकार के दबाव से मुक्त थी. तब ना तो  इतने समाचार पात्र थे और खबरिया चैनलों का कोई अता पता भी ना था. उस दौर के पत्रकार को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास था. बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, दादा माखनलाल चतुर्वेदी आदि ऐसे पत्रकार थे जो पत्रकारिता जगत के सर्वकालिक आदर्श कहे जाते हैं. उन्होंने "पत्रकारिता एक मिशन है" इस कथन को अपने कौशल द्वारा प्रमाणित किया.
                                                                                                       बात यदि वर्तमान समय की पत्रकारिता की करें तोह चारों ओर अफरा तफरी मची हुयी है. बाजारवाद इस कदर हावी हो गया है की आज का पत्रकार सही और गलत में फर्क करने में खुद को असमर्थ महसूस करता है. आज गली गली में अखबारों के कार्यालय हैं, गली गली में रिपोर्टर मजूद हैं. ख़बरों को जल्द से जल्द पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने  होड़ मची है. ऐसे में हमारे पत्रकार साथियों को याद रखना होगा की बाजारवाद और जिम्मेवारी के बीच बंधी पतली रस्सी पर चलने का कौशल ही पत्रकारिता है. इस पर ज़रा सा भी डगमगाए तोह काम चौपट समझिये.
                                                                                                        गुवाहाटी में घटित हालिया प्रकरण की यदि बात करें तो इस घटना के दो पहलू निकल कर आते हैं. एक घटना को कैमरे में कैद करने बाले पत्रकार पर आरोप लगा की उसने लड़की को बचने बजाये उस घटना को कैमरे में कैद करना जरूरी समझा. दूसरा यह भी की उसने अपने पत्रकारिता धर्म को प्राथमिकता दी. पत्रकार पर आरोप लगाने वाले और उन अभद्र लड़कों से सहानभूति रखने वाले लोगों को एक बारगी सोचना  चाहिए  की यदि वह ऐसा ना करता तो देश में ऐसे घिनौने कृत्य ना जाने रातों को कितनी सडकों पर होते होंगे जिनकी चर्चा तक नहीं होती.हमे तोह उस पत्रकार के प्रति उदार होना चाहिए जिसके प्रयास से यह मामला चर्चा के पटल तक  आया.

                                                                                                          मीडिया द्वारा ऐसे कृत्य उजागर होने के बावजूद  सरकार द्वारा जांच के आदेश और मुआवजे से ज्यादा कुछ नहीं करती. मीडिया का असली काम यहाँ से शुरू होता है. यदि किसी खबर को दिखाया जाता है तो उसे बीच में ना छोड़ा जाये. समय समय पर उस खबर की प्रगति पर भी नज़र रखनी चाहिए ( जिसे पत्रकारिता की भाषा में फोलो अप कहते हैं). हमे मुआवजे को इन्साफ समझने वाली मानसिकता से निकलना छाहिये. आज दर्शक समाचार चैंनल  की ताकत को समझता है, किन्तु स्वयं समाचार चैंनल बाजारवाद के बोझ के तले अपनी छमता विसार चुके हैं.
                                                                                                            मेरा सुझाव है की वर्तमान समय पुनः जागरण का उपयुक्त समय है. हमे बाजारवाद और अपने मिशन के बीच संतुलन बनाकर अपने कर्तव्यों और दाइत्य्वों का निर्वहन करना पड़ेगा............

2 comments:

  1. वैसे तो पूरा लेख अर्थपूर्ण है। लेकिन कमेँट का आॉप्शन देखकर खुजली हो ही जाती है । भाई कोशिश करे की . की जगह । लगाएं,लेख का सबसे सर्वोत्तम भाग आपका सुझाव है। ब्लागिंग की दुनियां में आपका स्वागत है।

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  2. आपका सुझाव सर आँखों पर। आगे भी इसी प्रकार मार्गदर्शन करें ।

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