Friday, 12 July 2013

कुछ तो कर .........


सिर्फ तुम्हारे लिए......

हम कबसे तेरे प्यार को तरसें, कुछ तो कर 
बूढ़े़ गमले बरसात को तरसें, कुछ तो कर

माना तेरा गैरों से रिस्ता ज्यादा अच्छा है,
अपने तेरे दीदार को तरसें, कुछ तो कर

बहुत हो चुकी छुपन छुपाई तेरे मेरे बीच,
बाहर निकल या कूकी मार, कुछ तो कर 

ज्यादा नहीं, बस तुझसे इक इश्क का ज़ुर्म है
सजा सुना या माफी दे, कुछ तो कर

ये अमावस की रात ना जाने कितनी लम्बी है,
तू छत पे आ या चांद बुला, कुछ तो कर.....
                                                            स्वरचित

Wednesday, 12 September 2012

तू भी मेरे संग चल ......

किसी अतिप्रिय को समर्पित ....  स्वरचित 

मैं तुम्हारे संग चला 
तू भी मेरे संग चल 
मैं तुम्हारे लिए बदला
तू भी मेरे लिए बदल

मैंने तोड़ी है कसमें तुम्हारे लिए 
मैंने छोड़ीं हैं रस्में तुम्हारे लिए 
तू भी कुछ कर दे पहल 

मैं तुम्हारे संग चला 
तू भी मेरे संग चल.......

मैं हूँ तुझसे खफा ये तुझे है पता 
तू है मुझसे खफा ये मुझे है पता 
आके मिल जो  निकालें समस्या का हल 

मैं तुम्हारे संग चला 
तू भी मेरे संग चल 
मैं तुम्हारे लिए बदला 
तू भी मेरे लिए बदल 

Wednesday, 25 July 2012

"अर्थ" खोता फ़िल्मी संगीत......

                                                                        
                                                                       दुनिया बनाने बाले का तेरे मन में समाई, तूने कहे को दुनिया बनाई...........ए मालिक तेरे बन्दे हम.........ए मेरे वतन के लोगों.......कर चले हम फ़िदा.....दिल दिया है जां भी देंगे ए वतन तेरे लिए........
                                                                                ऊपर जिन गानों का ज़िक्र किया गया है, उनकी अगर लिस्ट बनाने बैठें तो शायद आपके पास कागजों का अच्छा खासा बण्डल बनकर तैयार हो जायेगा ! अब सवाल यह उठता है कि अचानक ऐसे गानों की याद क्यों आन पड़ी, इसका जवाब आपको नीचे लिखा मिल जायेगा! लेकिन ऊपर जिस टाइप के गानें दिए गए  हैं उस टाइप के गानों से एक विशेष प्रकार का लगाव महसूस होता है! इन गानों को पुराना कहना  ग़लत रहा होगा इसीलिए शायद किसी ने "सदाबहार नग़में " जैसे शब्द का प्रयोग किया होगा!

                                                                                 यदि भारत में फ़िल्मी संगीत की बात करें तो "आलमआरा" में आवाज़ आने के बाद से ही फिल्मों में गीत और संगीत दोनों के लिए जगह तलाशने का काम शुरू हो गया था! समय चक्र के  साथ फ़िल्मी संगीत भी प्रगति करता रहा! एक ऐसा भी समय आया जब संगीत के बिना किसी फिल्म की कल्पना भी  नहीं की जाती थी! यह वह दौर था जब संगीत में नए नए प्रयोग हो रहे थे और नयी नयी प्रतिभाएं संगीत को यागदान देने के आरहीं थी! इस पूरे घटनाक्रम पर  यदि दृष्टि  डालें और उस दौर की फिल्मों के संगीत पर दृष्टि डाले तो  कहीं ना कहीं उस संगीत में एक "अर्थ" होता था! यह "अर्थ" उस दौर के दर्शकों का अपना "अर्थ" होता था! प्रत्येक व्यक्ति इन गीतों में स्वयं  को कहीं ना कहीं ही ढूंड लेता था!
                                                                                   इसके बाद एक ऐसा भी दौर आया जब फिल्मों में "रोमांटिक" गीतों की बहार आई! इन रोमांटिक गीतों में भी गाँव, गली, कसबे के युवा लड़कों को  एक नयी पहचान दी (कुछ गीतों ने तो कई युवाओं के प्रेम प्रसंग भी आगे बढ़ने में मदद की) ! आप यह तर्क दे सकते है की इन गीतों में कल्पनाओं को कुछ ज्यादा ही बढाकर पेश किया गया! लेकिन इसके बावजूद इन गीतों शब्दों में ऐसा जादू  था की वह कल्पनाएँ भी सच लगतीं थीं! 
                                                                                     1950-1990 तक एक समय ऐसा था जिसमे बनाने बाले गाने आज भी कहीं बजते हैं तो मन  एक बार रुक सुनाने को करता है! इन गीतों का संगीत तो लाजबाब था ही इनके "बोल" भी जिसे उधार की भाषा में "लिरिक्स" कहते है, भी लाजवाब हुआ करते थे! इस दौर में अनेक ऐसे गीतकार हुए जिनके शब्दों ने कल्पनाओं की एक नयी दुनिया का निर्माण किया! मजनूं सुल्तानपुरी, हजरत जयपुरी, आनद बक्शी, इन्दीवर, कैफ़ी आज़मी,गुलज़ार,जावेद अख्तर........नाम और भी हैं, ये वह नाम हैं जिनकी कलम ने फ़िल्मी गीतों को नयी बुलंदियां दीं ! उस दौर के गायकों को भी कौन भुला सकता है, चाहे वह दर्द में करहाती मुकेश की आवाज़ हो, रोमांटिक गीतों के बादशाह रफ़ी साहब हों या  युड़लई  युड़लई यूं करते किशोर कुमार हों!                                                                                                                                             अब बारी शुरुआत में उठाये गए सवाल के जवाब की आखिर इतनी रामायण की जरुरत क्यों आन पड़ी! आज के फ़िल्मी संगीत, उनके गीतों के बोल की तुलना जरा ऊपर बताये गए गीतों के साथ करें, जवाब आपको खुद व् खुद मिल जायेगा! आज के फ़िल्मी संगीत और उनके गीतों के बोल सुनकर यकीन नहीं होता कि गीतकारों और संगीतकारों की यह नयी पीढ़ी है! हमारे पास उर्दू, हिंदी और अनेक भाषाएँ होते हुए भी हमे "उधार  की भाषा" के शब्द अपने गीतों में प्रयोग करने पढ़ रहे हैं!
                                                                              अब कुछ उदहारण आज के गानों के.......दिल पे मारे टिप्पा,दिल बोले हड़प्पा.......तेरी शर्ट डा मैं तां बटन सोनिये.....चिकनी चमेली.......शीला.....मुन्नी.......टिंकू  जिया......अब समय आ गया है की हम विचार करें की क्या हम अपने सर्वकालिक गीतकारों और संगीतकारों की विरासत को यही रूप देना चाहते हैं.............................. 
              

Tuesday, 24 July 2012

मुआवज़ा इन्साफ नहीं है.......

                                                                आज हमारा समाज समझौतों का समाज हो गया है। हम हर स्तर पर समझौता करने के प्रयास में लगे रहते हैं। फिर चाहे वह राजनैतिक समझौते हो या सामाजिक। हम एक विशेष प्रकार की मुआवज़वादी मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं। हम इस विषय पर तनिक भी चिंतन नहीं करना चाहते की मुआवज़ा इन्साफ नहीं है। यदि मुआवज़ा इन्साफ होता यह समाज जिसे हम दोष देने में गुरेज नहीं करते कब का सुधर गया होता।
                                                                  आपके समक्ष कुछ उदाहरण रखना चाहूँगा जो कहीं ना कहीं मेरे और आपके इसी समाज की मुआवाज़वादी मानसिकता की तस्वीर दिखाते हैं।
१- एक लड़की पर सरेराह तेज़ाब फेंका जाता है। वैसे तो इस तरह की घटनाएँ अब आम बात हो गयी हैं किन्तु यदि किसी करणवश यह मुद्दा मीडिया की नज़र में आ जाता है तो कुछेक दिन का हो हल्ला और अंत में लड़की को २०-२५ हजार का मुआवज़ा......
२- पश्चिम बंगाल में ब्रहमपुत्र नदी में एक नाव पर क्षमता से कहीं गुना  ज्यादा लोग नदी पार करते हैं और नाव पलती है।
इसमें कई जाने जाती हैं। लेकिन हमे सरकार की तरफ से क्या मिलता है सिर्फ मुआवज़ा...........
३- भोपाल में हुयी सदी की सबसे बड़ी गैस त्रासदी को कौन भूल सकता है. आज भी भोपाल के उस हादसे को याद कर सिहर उठते  हैं, लेकिन सरकार उस घटना के आरोपी को सजा दिलाने वजाए मुआवजे का मरहम लगा रही है।
४- पिछले दिनों महाराष्ट्र मंत्रालय में आग लगने के बाद देश के विभिन्न हिस्सों से आग की ख़बरें आनी शुरू ही गयी।दिल्ली में भी एक झुग्गी बस्ती में आग लगी उसमें भी पीड़ितों को क्या मिला. मुआवज़ा.......
                                                                मुआवज़ा....  मुआवज़ा.......मुआवज़ा.......हम और हमारी सरकार आखिर कब तक की आड़ में पीड़ितों को और प्रताड़ित करते रहेंगे. आखिर कब हम घटना के कारणों को खंगालेंगे और उन्हें समाप्त करेंगे। हमे इस मुआवाज़वादी मानसिकता को पूर्ण रूप समाप्त करना होगा. घटना के कारकों का समूल नाश करना होगा, अन्यथा आज़ादी के ६५ साल तो क्या हमें विकसित होने के लिए और ६५ साल इंतज़ार करना पड़ेगा।                  

Monday, 23 July 2012

समझ खोती मीडिया......


 पत्रकारिता का प्रादुर्भाव एक मिशन के रूप में हुआ था. आज से यदि चार पांच दशक पहले की पत्रकारिता पर द्रष्टिपात करें तो पत्रकारिता का स्वरुप वर्तमान की पत्रकारिता से बिलकुल भिन्न था. उस दौर की पत्रकारिता किसी भी  प्रकार के दबाव से मुक्त थी. तब ना तो  इतने समाचार पात्र थे और खबरिया चैनलों का कोई अता पता भी ना था. उस दौर के पत्रकार को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास था. बाल गंगाधर तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, दादा माखनलाल चतुर्वेदी आदि ऐसे पत्रकार थे जो पत्रकारिता जगत के सर्वकालिक आदर्श कहे जाते हैं. उन्होंने "पत्रकारिता एक मिशन है" इस कथन को अपने कौशल द्वारा प्रमाणित किया.
                                                                                                       बात यदि वर्तमान समय की पत्रकारिता की करें तोह चारों ओर अफरा तफरी मची हुयी है. बाजारवाद इस कदर हावी हो गया है की आज का पत्रकार सही और गलत में फर्क करने में खुद को असमर्थ महसूस करता है. आज गली गली में अखबारों के कार्यालय हैं, गली गली में रिपोर्टर मजूद हैं. ख़बरों को जल्द से जल्द पाठकों और दर्शकों तक पहुँचाने  होड़ मची है. ऐसे में हमारे पत्रकार साथियों को याद रखना होगा की बाजारवाद और जिम्मेवारी के बीच बंधी पतली रस्सी पर चलने का कौशल ही पत्रकारिता है. इस पर ज़रा सा भी डगमगाए तोह काम चौपट समझिये.
                                                                                                        गुवाहाटी में घटित हालिया प्रकरण की यदि बात करें तो इस घटना के दो पहलू निकल कर आते हैं. एक घटना को कैमरे में कैद करने बाले पत्रकार पर आरोप लगा की उसने लड़की को बचने बजाये उस घटना को कैमरे में कैद करना जरूरी समझा. दूसरा यह भी की उसने अपने पत्रकारिता धर्म को प्राथमिकता दी. पत्रकार पर आरोप लगाने वाले और उन अभद्र लड़कों से सहानभूति रखने वाले लोगों को एक बारगी सोचना  चाहिए  की यदि वह ऐसा ना करता तो देश में ऐसे घिनौने कृत्य ना जाने रातों को कितनी सडकों पर होते होंगे जिनकी चर्चा तक नहीं होती.हमे तोह उस पत्रकार के प्रति उदार होना चाहिए जिसके प्रयास से यह मामला चर्चा के पटल तक  आया.

                                                                                                          मीडिया द्वारा ऐसे कृत्य उजागर होने के बावजूद  सरकार द्वारा जांच के आदेश और मुआवजे से ज्यादा कुछ नहीं करती. मीडिया का असली काम यहाँ से शुरू होता है. यदि किसी खबर को दिखाया जाता है तो उसे बीच में ना छोड़ा जाये. समय समय पर उस खबर की प्रगति पर भी नज़र रखनी चाहिए ( जिसे पत्रकारिता की भाषा में फोलो अप कहते हैं). हमे मुआवजे को इन्साफ समझने वाली मानसिकता से निकलना छाहिये. आज दर्शक समाचार चैंनल  की ताकत को समझता है, किन्तु स्वयं समाचार चैंनल बाजारवाद के बोझ के तले अपनी छमता विसार चुके हैं.
                                                                                                            मेरा सुझाव है की वर्तमान समय पुनः जागरण का उपयुक्त समय है. हमे बाजारवाद और अपने मिशन के बीच संतुलन बनाकर अपने कर्तव्यों और दाइत्य्वों का निर्वहन करना पड़ेगा............