दुनिया बनाने बाले का तेरे मन में समाई, तूने कहे को दुनिया बनाई...........ए मालिक तेरे बन्दे हम.........ए मेरे वतन के लोगों.......कर चले हम फ़िदा.....दिल दिया है जां भी देंगे ए वतन तेरे लिए........
ऊपर जिन गानों का ज़िक्र किया गया है, उनकी अगर लिस्ट बनाने बैठें तो शायद आपके पास कागजों का अच्छा खासा बण्डल बनकर तैयार हो जायेगा ! अब सवाल यह उठता है कि अचानक ऐसे गानों की याद क्यों आन पड़ी, इसका जवाब आपको नीचे लिखा मिल जायेगा! लेकिन ऊपर जिस टाइप के गानें दिए गए हैं उस टाइप के गानों से एक विशेष प्रकार का लगाव महसूस होता है! इन गानों को पुराना कहना ग़लत रहा होगा इसीलिए शायद किसी ने "सदाबहार नग़में " जैसे शब्द का प्रयोग किया होगा!
यदि भारत में फ़िल्मी संगीत की बात करें तो "आलमआरा" में आवाज़ आने के बाद से ही फिल्मों में गीत और संगीत दोनों के लिए जगह तलाशने का काम शुरू हो गया था! समय चक्र के साथ फ़िल्मी संगीत भी प्रगति करता रहा! एक ऐसा भी समय आया जब संगीत के बिना किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं की जाती थी! यह वह दौर था जब संगीत में नए नए प्रयोग हो रहे थे और नयी नयी प्रतिभाएं संगीत को यागदान देने के आरहीं थी! इस पूरे घटनाक्रम पर यदि दृष्टि डालें और उस दौर की फिल्मों के संगीत पर दृष्टि डाले तो कहीं ना कहीं उस संगीत में एक "अर्थ" होता था! यह "अर्थ" उस दौर के दर्शकों का अपना "अर्थ" होता था! प्रत्येक व्यक्ति इन गीतों में स्वयं को कहीं ना कहीं ही ढूंड लेता था!
इसके बाद एक ऐसा भी दौर आया जब फिल्मों में "रोमांटिक" गीतों की बहार आई! इन रोमांटिक गीतों में भी गाँव, गली, कसबे के युवा लड़कों को एक नयी पहचान दी (कुछ गीतों ने तो कई युवाओं के प्रेम प्रसंग भी आगे बढ़ने में मदद की) ! आप यह तर्क दे सकते है की इन गीतों में कल्पनाओं को कुछ ज्यादा ही बढाकर पेश किया गया! लेकिन इसके बावजूद इन गीतों शब्दों में ऐसा जादू था की वह कल्पनाएँ भी सच लगतीं थीं!
1950-1990 तक एक समय ऐसा था जिसमे बनाने बाले गाने आज भी कहीं बजते हैं तो मन एक बार रुक सुनाने को करता है! इन गीतों का संगीत तो लाजबाब था ही इनके "बोल" भी जिसे उधार की भाषा में "लिरिक्स" कहते है, भी लाजवाब हुआ करते थे! इस दौर में अनेक ऐसे गीतकार हुए जिनके शब्दों ने कल्पनाओं की एक नयी दुनिया का निर्माण किया! मजनूं सुल्तानपुरी, हजरत जयपुरी, आनद बक्शी, इन्दीवर, कैफ़ी आज़मी,गुलज़ार,जावेद अख्तर........नाम और भी हैं, ये वह नाम हैं जिनकी कलम ने फ़िल्मी गीतों को नयी बुलंदियां दीं ! उस दौर के गायकों को भी कौन भुला सकता है, चाहे वह दर्द में करहाती मुकेश की आवाज़ हो, रोमांटिक गीतों के बादशाह रफ़ी साहब हों या युड़लई युड़लई यूं करते किशोर कुमार हों! अब बारी शुरुआत में उठाये गए सवाल के जवाब की आखिर इतनी रामायण की जरुरत क्यों आन पड़ी! आज के फ़िल्मी संगीत, उनके गीतों के बोल की तुलना जरा ऊपर बताये गए गीतों के साथ करें, जवाब आपको खुद व् खुद मिल जायेगा! आज के फ़िल्मी संगीत और उनके गीतों के बोल सुनकर यकीन नहीं होता कि गीतकारों और संगीतकारों की यह नयी पीढ़ी है! हमारे पास उर्दू, हिंदी और अनेक भाषाएँ होते हुए भी हमे "उधार की भाषा" के शब्द अपने गीतों में प्रयोग करने पढ़ रहे हैं!
अब कुछ उदहारण आज के गानों के.......दिल पे मारे टिप्पा,दिल बोले हड़प्पा.......तेरी शर्ट डा मैं तां बटन सोनिये.....चिकनी चमेली.......शीला.....मुन्नी.......टिंकू जिया......अब समय आ गया है की हम विचार करें की क्या हम अपने सर्वकालिक गीतकारों और संगीतकारों की विरासत को यही रूप देना चाहते हैं..............................